होरी का पुतला
बस आज फिर होरी दिखा। वह पहले भी कहीं दिखा था। या जो दिखा वह शायद होरी का अपना कोई सगा था। वह बुंदेलखंड से आया था या बिदर्भ से था। उसे किसी ने नहीं देखा। वह चोर की तरह देख रहा था सब कुछ। हारा फटेहाल। उसे मैंने भीनहीं देखा। हम उसे देख कर क्या कर लेते। बस...
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बोधिसत्व
मेरी कविता
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[15 May 2010 13:20 PM]



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