गाँव में छत पर सोना...पुरूआ बयार....टूटता तारा....छूटता लुक्क....चंदा मामा... आरे पारे......ग्राम्य सीरिज....और मैं सतीश पंचम
गाँव में खुले छत पर सोने का आनंद ही कुछ और होता है। आप छत पर पडे पडे आकाश में लटके सितारों को देख रहे हैं…..चाँद दिख रहा है….उसमें किसी का चेहरा ढूँढा जा रहा है….बचपन की लोरी याद आ रही है…चंदा मामा आरे आवा…पारे आवा…नदिया किनारे आवा…दूध...
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सतीश पंचम
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[15 May 2010 12:21 PM]



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