जनाब "सरवर" की एक ग़ज़ल : हम हुए गर्दिश-ए-दौरां.....
हम हुए गर्दिश-ए-दौरां से परेशां क्या क्या ! क्या था अफ़्साना-ए-जां और थे उन्वां क्या क्या ! हर नफ़स इक नया अफ़्साना सुना कर गुज़रा दिल पे फिर बीत गयी शाम-ए-ग़रीबां क्या क्या ! तेरे आवारा कहाँ जायें किसे अपना कहें ? तुझ से उम्मीद थी ऐ शहर-ए-निगारां क्या क्या...
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आनन्द पाठक
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[15 May 2010 10:29 AM]



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