वीरेंद्र हमदम की ग़ज़ल
मित्रों आइये आज वीरेंद्र हमदम की ग़ज़ल सुनते हैं. ये ग़ज़ल साहित्य की मशहूर पत्रिका अभिनव कदम में साया हो चुकी है ---कब किसी को तल्खियाँ अच्छी लगींभूख थी तो रोटियां अच्छी लगीं जल उठे मेरी मशक्कत के चिरागपत्थरों की सख्तियाँ अच्छी लगींक्यों रहें कमजोर...
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डा.सुभाष राय
kavita
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[15 May 2010 08:53 AM]



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