मैं दागदार चाँद हूँ गगन का
रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती हैइस तरह से प्रणय हुआ संभव कहीं हैसंस्कार मुझसे छूटने वाले नहीऔर तू नहीं लाज तजना चाहती हैरे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती हैइस तरह आराधन भी अच्छा नहीं हैमैं निरा-निपट पाषाण औरतू देव मूरत गढ़ना चाहती हैरे मीत,...
[पूरी पोस्ट]
डॉ. राजेश नीरव
8
0
0
0
3
[15 May 2010 08:59 AM]



Shuffle








