वीरेंद्र हमदम की ग़ज़ल

bat-bebat मित्रों आइये आज वीरेंद्र हमदम की ग़ज़ल सुनते हैं. ये ग़ज़ल साहित्य की मशहूर पत्रिका अभिनव कदम में साया हो चुकी है --- कब किसी को तल्खियाँ अच्छी लगीं भूख थी तो रोटियां अच्छी लगीं जल उठे मेरी मशक्कत के चिराग पत्थरों की सख्तियाँ अच्छी लगीं क्यों रहें कमजोर... [पूरी पोस्ट]
writer डा.सुभाष राय
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[15 May 2010 08:49 AM]

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