(ग़ज़ल) - बाग़ी
शेयरशहर का आलम बाग़ी हो तब तो घर से बाहर निकलेंअभी तो सड़कों पर मुर्दे जाकर किससे क्या बात करेंकुछ आग जले या धूप खिले या चिंगारी ही मिल जाएअभी तो फैली धुंध ही धुंध बैठे हम हाथ पर हाथ धरेहर रोज सताए जाते जो उनकी सिसकी ही सुनाई देअभी तो सिले हुए हैं लब कुछ...
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माणिक
ashok jamnani
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[15 May 2010 03:39 AM]



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