जालिम तेरी अंगड़ाई का क्या है
दीवारें-पर्दे-धागे, मंच-दर्शक परायेकठपुतलियों की खुदाई का क्या हैकर दिखाने-मर दिखाने में, गुंजाइश हैवरना केंचुओं की लड़ाई का क्या हैमुझमें ही कुछ तूफान उठें हैंजालिम तेरी अंगड़ाई का क्या हैअपनी ही नस चढ़ जाये तो दर्द हैलाख हो पीड़ पराई का क्या हैराधा ही...
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Rajey Sha
ग़ज़ल
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[15 May 2010 03:28 AM]



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