सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
शायर नज़ीर अकबराबादी (1735-1830) ने बंजारानामा के गीत “सब ठाठ पड़ा रह जावेगा” में मानव जीवन का सच उढ़ेल कर रख दिया।
“लाद चलेगा बंजारा” भारत के आध्यात्मिक परिवेश का एक प्रतिनिधि भी है।
टुक हिर्सो-हवा (लालच) को छोड़ मियां, मत देस-बिदेस...
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Rakesh
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[14 May 2010 22:58 PM]



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