अगर बचाना है भारत को, गऊ को आज बचाएं हम
एक लेखक के नाते समजिक सरोकारों से जुडा रहता हूँ. सामाजिक मोर्चे पर लेखक को एक नागरिक की तरह तैनात रहना चाहिए. लेकिन कुछ लोग केवल लेखन तक सीमित रहते है. मै विनम्रतापूर्वक उससे भी आगे बढ़कर समाज के लिए कुछ करना चाहता हूँ. वैसे घोर नास्तिक हूँ, फिर भी...
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girish pankaj
सवक्तव्य-गीत
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[14 May 2010 13:57 PM]



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