“आदमी की हबस” (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
“एक पुरानी कविता”जिन्दगी क्या मौत पर भी, अब हबस छाने लगी। आदमी को, आदमी की हबस ही खाने लगी।।हबस के कारण, यहाँ गणतन्त्रता भी सो गई। दासता सी आज, आजादी निबल को हो गई।।पालिकाओं और सदन में, हबस का ही शोर है। हबस के कारण, बशर लगने लगा अब चोर है।।उच्च-शिक्षा...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
कविता
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[14 May 2010 12:12 PM]



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