वो किसी दामन मे कुछ काँटे सज़ा के आ रहे हैं...बोलकर हमसे गये थे गम भुलाने जा रहे हैं....
स्वप्न जालों मे फँसे, बिस्तर से जो चिपके पड़े थे...देख गोली, मूषकों से बिल मे जो दुबके हुए थे...थी बहुत शर्मिंदगी अंगड़ाइयों को भी मगर...जागकर भी नींद की डाली खड़े थे थाम कर...आज लेकिन जोश मे खुशियाँ मनाने जा रहे हैं...आज आलस छोड़कर ये घर जलाने जा रहे...
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दिलीप
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[14 May 2010 10:16 AM]



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