बैठ खेत में इसको खाया : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक' की एक बालकविता
बैठ खेत में इसको खाया-----------------------------------------------जब गरमी की ऋतु आती है!लू तन-मन को झुलसाती है!!तब आता तरबूज सुहाना!ठंडक देता इसको खाना!!यह बाज़ारों में बिकते हैं!फुटबॉलों जैसे दिखते हैं!!एक रोज़ मन में यह ठाना!देखें इनका...
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रावेंद्रकुमार रवि
बालकविता
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[14 May 2010 05:36 AM]



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