नीरव सत्य
रात दौड़ती जा रही ,सन्नाटे के साये में .दोनों ओर खड़े पेड़ हाथ फैला रोकना चाहते हों पथ मानो.एक लम्बी लपलपाती जीभ की तरह फैली सड़क .यह सफ़र मुंह से पेट या जीवन से मृत्यु का ?छूटता जा रहा है पीछे नीरव सत्य .मन में फट पड़े विचारों के सैकड़ों ज्वालामुखी .तप्त...
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अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી
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[14 May 2010 05:47 AM]



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