मैं लिखता रहा, तुम डिलिट करती रही
मैं लिखता रहा, तुम डिलिट करती रहीमेरी बाते मेरी मेल में सड़ती रहीन बरसी, न गरजी, न निकली कभीबदली उमंगों की दिल में सिकुड़ती रहीलिखने को लिख गए ज्ञानी-ध्यानी बाते कईऔर दुनिया अधकचरे ब्लॉग पढ़ती रहीकवि की कल्पना को कैसे ताले लगेमाँ की सूरत एक सी गढ़ती रहीवो...
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Rahul Upadhyaya
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[14 May 2010 04:02 AM]



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