छीने भले तुझसे ये धरती आसमा
तू सोया रहियो भले जमीन खिसक जाए तू टुकडो में बटा रहियो भले ऊँगली की तरह चटक जाए सब कुछ गवाकर भी न जागा उनकी कुर्बानियों को भी भुलाता गया देश में भले गद्दार हो घर के बाहर दुश्मन की तलवार हो तू जागेगा नही भले ये जमीन छीन जाए देश से पहले तेरी कोई...
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vikas mehta
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[14 May 2010 03:50 AM]



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