भर्तृहरि नीति शतक-दूसरों का मुंह ताकने से कोई लाभ नहीं
किं कन्दाः कन्दरेभ्यः प्रलयमुपगता निर्झरा वा गिरिभ्यःप्रघ्वस्ता तरुभ्यः सरसफलभृतो वल्कलिन्यश्च शाखाः।वीक्ष्यन्ते यन्मुखानि प्रस्भमपगतप्रश्रयाणां खलानांदुःखाप्तसवल्पवित्तस्मय पवनवशान्नर्तितभ्रुलतानि ।।हिंदी में भावार्थ- वन और पर्वतों पर क्या फल और अन्य...
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दीपक भारतदीप
आध्यात्म
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[13 May 2010 23:18 PM]



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