कौन कहता है कि ,तू मुर्दा नहीं है॥

naturica मुल्क पर उन जैसा हक़, मेरा नहीं है ।नागरिक तो हूँ मगर ,पैसा नहीं है॥पहले भी रोज़ो-शब् , न थे अच्छे मगर।अब हमारे हाल पर , पर्दा नहीं है॥तुम ऐसे वक़्त मेरी, छाँव की तलाश।तपी है पीठ उस पर कपडा नहीं है॥हुई तसल्ली शहर की , बदहवाशी से।दिले बर्बाद हाल तू ,तनहा... [पूरी पोस्ट]
writer Deepak Tiruwa

ग़ज़ल

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[13 May 2010 22:39 PM]

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