A poetess blog
टूटी बिखरी किरचों को मै चिपकाती रहती हूँगीत अधूरा या हो पूरा गुनगुनाती रहती हूँरंग बिरंगे लम्हे सीकर चादर सी बुन ली हैबेरंगे लम्हों में उसे ओढ़कर सो जाती हूँ...
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ranjana
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[13 May 2010 17:28 PM]



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