हम तुम्हारे लिए जाल बुनने लगे,तुम हमारे लिए फंदे कसने लगे-----(विनोद कुमार पांडेय)

मुस्कुराते पल-कुछ सच कुछ सपने हम तुम्हारे लिए जाल बुनने लगे,तुम हमारे लिए फंदे कसने लगे,आज फ़ितरत यहीं आदमी की हुई,आदमी आदमी को ही डसने लगे.ना दुआएँ रही याद माँ-बाप की,हर तरक्की पे अपने हरषने लगे.जिस पिता ने गले से लगा कर रखा,अब वहीं इक झलक को तरसने लगे.स्नेह आदर में ऐसी मिलावट... [पूरी पोस्ट]
writer विनोद कुमार पांडेय
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[13 May 2010 12:10 PM]

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