अब तो भीड़ लगा दो चल के चूड़ी के बाज़ार में....

दिल की कलम से... लोकतंत्र का मंदिर धधका, फिर भी हम खामोश रहे....माँ कितना तड़पी होगी वो दिल के टुकड़े गोद लिए...कुछ दमड़ी के टुकड़े देकर कुर्बानी को तोल दिया...जिंदा है गद्दार अभी तक, उनको कैसा मोल दिया...गीदड़ हमने चुन के भेजे, खुद अपनी सरकार में...अब तो भीड़ लगा दो चल... [पूरी पोस्ट]
writer दिलीप
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[13 May 2010 11:31 AM]

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