देखना कैसे-कैसे मर्द है यहाँ?-कुंवर जी,

kunwarji's बैलगाड़ी धेरे-धीरे टुमक-टुमक चल रही थी जी!अब वो तो बैलगाड़ी थी ऐसे ही चलनी थी!जितने यात्री उसमे बैठे वो बोर भी नहीं हो रहे थे,सभी को आदत थी उसमे सफ़र करने की!उनमे एक भाई साहब कुछ अलग से दिख रहे थे!सौभाग्य से या दुर्भाग्य से घडी केवल उन्ही के पास थी... [पूरी पोस्ट]
writer kunwarji's

(हास्य-वयंग्य)

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[13 May 2010 09:51 AM]

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