"पथ के स्वामी"

लक्ष्य दूर, भले हो कितना, पथ हो दुष्कर, चाहे जितना, फूल बिछे हों, या अंगारे ,चलना, उतना ही पड़ता हैलाख हों भय, या हो असमंजस, थका जिस्म, या हो उकताहट, श्रम से, जितना चाहे भागें, अंत में, बढ़ना ही पड़ता हैलड़ना, पहले होता है, अपने से, फिर कठिनाई से,ख़ुद को... [पूरी पोस्ट]
writer योगेश शर्मा
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[13 May 2010 09:48 AM]

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