“ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
मोक्ष के लक्ष को मापने के लिए, जाने कितने जनम और मरण चाहिए । प्यार का राग आलापने के लिए,शुद्ध स्वर, ताल, लय, उपकरण चाहिए।।लैला-मजनूँ को गुजरे जमाना हुआ,किस्सा-ए हीर-रांझा पुराना हुआ, प्रीत की पोथियाँ बाँचने के लिए- ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए । प्यार का...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
गीत
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[13 May 2010 09:36 AM]



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