तब तलक गम को सहेजूँ
दर्द को समेटू कहाँ तक कब तलक गम को सहेजूँजार-जार रोता है दिलरक्तिम है हर कोनाकोई मरहम, मैं पाऊँगामुश्किल लगता ऐसा होनादर्द को समेटू कहाँ तक कब तलक गम को सहेजूँतज इसे सकता नहीं मैंसाथ निभ सकता नहींमजबूर है हालात इतनेखुल कर रो भी सकता नहींदर्द को समेटू...
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डॉ. राजेश नीरव
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[13 May 2010 08:49 AM]



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