दिल में उतर रही हूँ मैं

कुछ कहानियाँ,कुछ नज्में कितना संभल कर चल रही हूँ मैं फिर भी ना जाने क्यों फिसल रही हूँ मैं आइना हर रोज़ दिखता है निशाँ नए इस कदर ना जाने क्यों बदल रही हूँ मैं जब से चढ़ी है नज़र में खुमारी किसी के दिल में उतर रही हूँ मैं कल सरी महफ़िल शमा कतरा गई मुझसे या खुदा इस कदर निखर रही हूँ... [पूरी पोस्ट]
writer Sonal Rastogi

हिन्दी पोएम

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[13 May 2010 04:42 AM]

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