आँचल माँ का
हर शै थी अन्जान यहाँ मैं सिर्फ जानता आँचल माँ का उन नन्ही आँखों की धरती, आसमान था आँचल माँ का हर पीड़ा, दुःख, डर मिट जाता उस वितान के नीचे आकर बचपन के माथे पर उभरा हर गुमान था आँचल माँ का तरुणाई की आँखों में जब सपनों के अंकुर फूटे उनके पोषण हेतु हवा, जल...
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प्रताप नारायण सिंह
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[13 May 2010 04:10 AM]



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