मिलन की कोई रात आई ही नहीं

Awaz Do Hum Ko रात तारीकियों का पहरा थामेरी खिड़की के दोनों दरवाज़ेहवा के तुन्द झोंकों से लड़ रहे थेचंद जुगनू कभी चमक करकेतीरगी से भरी मेरी कोठरी मेंखैरात में रौशनी के चंद टुकड़े उंडेल देते थेसारी दुनिया थी अपने ख़्वाबों मेंमैं तुम्हारे ख़्यालों में जागता ही रहावक्त की... [पूरी पोस्ट]
writer Razi Shahab
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[13 May 2010 02:13 AM]

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