आकांक्षा
अश्रु मेरी अमर निधि हैं, तुम मधुर मुस्कान ले लो,किन्तु प्रियतम तुम न मेरे भग्न उर के साथ खेलो !है मुझे अभिशाप ही प्रिय आस क्यों वरदान की फिर,क्या कभी सुखमय पलों की कल्पना रह सकी स्थिर ! अब न उतनी शक्ति मुझमें सह सकूँ अवहेलना प्रिय,और साहस भी न इतना कह...
[पूरी पोस्ट]
Sadhana Vaid
17
0
0
0
11
[12 May 2010 20:57 PM]



Shuffle







