आकांक्षा

Unmanaa अश्रु मेरी अमर निधि हैं, तुम मधुर मुस्कान ले लो,किन्तु प्रियतम तुम न मेरे भग्न उर के साथ खेलो !है मुझे अभिशाप ही प्रिय आस क्यों वरदान की फिर,क्या कभी सुखमय पलों की कल्पना रह सकी स्थिर ! अब न उतनी शक्ति मुझमें सह सकूँ अवहेलना प्रिय,और साहस भी न इतना कह... [पूरी पोस्ट]
writer Sadhana Vaid
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[12 May 2010 20:57 PM]

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