अंधड़....
जब भी सोचता हूँ मैं कुछ पल पा जाऊँ चैन के और सो सकूँ एक रात बिना किसी विचार के बिना किसी इन्तजार के... अपने में सिमटा मैं... तब जाने कैसे हवा का एक झोंका जान लेता है मेरे इरादों को और आ जाता है बन कर अंधड़ मेरी सोच के घोंसले को उजाड़ने...
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Udan Tashtari
कविता
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[12 May 2010 21:02 PM]



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