ग़ालिब दीवाने थे क्या ?
आज अचानक दाग देहलवी का एक जाना पहचाना मकता कान में पड़ा तो भोपाल की कुछ यादें ताज़ा हो गयीं ...शेर कुछ यूं है- है खेल नहीं दाग,यारों से ये कह दो के आती है उर्दू जुबान आते-आते भोपाल में माखन लाल विश्वविद्यालय में हमारे एक सहपाठी हुआ करते थे । एक दिन जनाब...
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हिमांशु बाजपेयी
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[12 May 2010 12:56 PM]



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