तेरी आवाज़, को काग़ज़ पे रखके, मैंने चाहा था कि पिन कर लूँ........

वेबलाग पर... गुलज़ार पर कुछ लिखना जैसे मन के कितने कोनो से गुजरना है .....कितनी जिंदगियो को रिवाइंड करना है .....वो मेरे लिए उस कोर्स की किताब की  माफिक है जिसे जितनी बार पढ़ा जाये.भीतर सेहर बार नया कुछ निकाल देती है ........इक नज़्म की चोरी इक नज़्म मेरी चोरी कर... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ .अनुराग
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[12 May 2010 11:55 AM]

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