आँखों को अब अश्रु नही अंगार चाहिए.....

दिल की कलम से... बहुत हो लिया विकल हृदय इन प्रेम की अंधी गलियों मे...भ्रमित रहा मन जाने कबसे सच्ची झूठी कलियों से...अदिश भाव ये जाने कबसे मन को मेरे जला रहे...कबसे झूठे व्यापरों मे मुझ निर्धन को फँसा रहे...अब मुझको नव स्वप्न नदी की धार चाहिए...आँखों को अब अश्रु नही अंगार... [पूरी पोस्ट]
writer दिलीप
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[12 May 2010 10:23 AM]

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