खीज से जन्मे हुए शब्दों को जब भी तोलें

युग-विमर्श  (YUG -VIMARSH)   یگ ومرش खीज से जन्मे हुए शब्दों को जब भी तोलें।झिड़कियाँ माँ की मेरे कानों में अमृत घोलें॥देखें बचपन की उन आज़ादियों की तस्वीरें,बैठें जब साथ अतीतों की भी गिरहें खोलें॥रात में भी तो उजालों की ज़रूरत होगी, आओ कुछ धूप के टुकड़ों को ही घर में बो लें॥आस्तीनों से... [पूरी पोस्ट]
writer युग-विमर्श
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[12 May 2010 09:25 AM]

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