'रिश्तों का पिंजरा '
द्वार खुला कबसे, पिंजरे का ,पंछी, फिर भी बैठा है,"उड़ जा उड़ जा,वक्त यही है",पल पल खुद से कहता है,लाख जतन कर भी, उड़ने की,हिम्मत जुटा न पाता है,पंख भी हैं, है मौक़ा भी फिर भी उड़ ना पाता है,है ऐसा क्या, जो रोके रस्ता कैद से मुक्ति पाने का,प्रेम है ये...
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योगेश शर्मा
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[12 May 2010 08:46 AM]



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