नहीं हूँ मुक्तक और ग़ज़ल्
नहीं हूँ मुक्तक और ग़ज़ल्। समय की हूं रोचक हलचल्।पढ न सकोगे मुझको तुम,अक्षर-अक्षर तरल-तरल॥चिन्तन मेरा अमृत-कुण्ड, वाणी मेरी गंगाजल ॥बाहर से हूं वज्र समान,भीतर से बेहद कोमल्॥नीलकंठ का है संकल्प,गरल समाहित वक्षस्थल्॥कभी हूं बिंदिया माथे की, कभी हूं आँखों...
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युग-विमर्श
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[12 May 2010 05:09 AM]



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