विनाश से सृजन की ओर

धान के देश में! (स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)विनाश से सृजन की ओर-मुख मोड़ और चल,धूर्त-पथ त्याग कर,मानव मन बन निश्छल।विनाशिनी संहारिणी शक्ति-तेरी ही कृति का प्रतिफल,मोड़ दे अपनी दिशा,उत्फुल्ल कर शतदल कमल,कृत्रिम से प्रकृति उत्तमशान्त सुन्दर धवल,तो फिर ओ अशान्त... [पूरी पोस्ट]
writer जी.के. अवधिया
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[12 May 2010 01:20 AM]

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