महेंद्रभटनागर : कविता
ग्रीष्म[महेंद्रभटनागर]तपता अम्बर, तपती धरती,तपता रे जगती का कण-कण !.त्रस्त विरल सूखे खेतों पर बरस रही है ज्वाला भारी,चक्रवात, लू गरम-गरम सेझुलस रही है क्यारी-क्यारी, चमक रहा सविता के फैले प्रकाश से व्योम-अवनि-आँगन !. जर्जर कुटियों से दूर कहींसूखी घास लिए...
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Dr. Mahendra Bhatnagar
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[12 May 2010 00:45 AM]



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