ये बंदर कहीं कल इंसान तो नही बन जाएगा...

दिल की कलम से... कल मुंडेर पे एक बंदर था मुझे दिखाई दिया...शांत बैठा था, शायद खुद मे ही कहीं गुम था...तभी एक बंदरिया ने उसे हल्के से था भींचा...उस ध्यान की डोर को था अपनी ओर खींचा...एक नन्हा भी बंदरिया की गोद से चिपका था...माँ की छाती से मासूम प्यार से चिपटा था...फिर वो... [पूरी पोस्ट]
writer दिलीप
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[11 May 2010 10:15 AM]

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