नित नित

मनोरमा पूरे होते उसके सपने लगन हो जिसमे खास।कहीं अधूरे हों सपने तो जीवन लगे उदास।हों पूरे या रहे अधूरे मरे कभी ना सपना,जीवन में नित नित बढ़ते हैं सपनों से विश्वास।।आम-आदमी के जीवन से हुआ आम अब दूर।दाम बढ़े हैं आम के ऐसे आम-लोग मजबूर।सरकारें तो आम-लोग की शासक... [पूरी पोस्ट]
writer श्यामल सुमन

कविता

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[11 May 2010 09:35 AM]

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