कलम के गद्दारों को जिन्दा गड़वा दो
मानवता की धमनी में जबजाति धर्म का विष बहता होछोड़ गरीबों की चिंतापूंजीवादी पुराण को बाचाता हो संविधान का अम्बेडकर जब सडकों पर जूता सिलता हो आजादी का भगत सिंह जब कूड़े का जूठा पत्तल चाटता हो माथे की बिंदी हिंदी ही जबघर की बनवासिनी सीता होइस शासन की कुशासन...
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aarya
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[11 May 2010 08:27 AM]



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