एक गीतिका : तुम भीड़ खरीदी देखे हो ....

गीत  ग़ज़ल  औ गीतिका तुम भीड़ खरीदी देखे हो ,ज़ज्बात नहीं देखा होगा सत्ता की हिला दें बुनियादें ,उन्माद नहीं देखा होगा जो शीश झुका के बैठे हैं ,वो बिके हुए दरबारी हैं आदर्शों पर मर-मिटने का उत्साह नहीं देखा होगा तुम भीख बाँटते फिरते हो वादे झू्ठे आश्वासन के खाली पेटों की आहों... [पूरी पोस्ट]
writer आनन्द पाठक
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[07 May 2010 02:10 AM]

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