भर्तृहरि नीति शतक-राजाओं को कब तक प्रसन्न रखा जा सकता है

दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका दुरारध्याश्चामी तुरचलचित्ताः क्षितिभुजो वयंतु स्थूलेच्छाः सुमहति बद्धमनसः। जरा देहं मृत्युरति दयितं जीवितमिदंसखे नानयच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः।।हिंदी में भावार्थ- जिन राजाओं का मन घोड़े की तरह दौड़ता है उनको कोई कब तक प्रसन्न रख सकता है। हमारी... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक भारतदीप

हिन्दू-धर्म

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[10 May 2010 23:06 PM]

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