मृत्युस्वप्न
मैं प्यार करूँ, इस जीवन को जो चुपके से आ जाता है,मदुराई सी आंख मिचौली हमसे ये खेल जाता है.मैंने देखा था, एक प्यारा सपना; जो पल भर भी न रहा अपना रो रहे थे सारे आपने, पर मैं गुमसुम था यूँ ही अपना मैंने चाहा, मैंने सोचा, ये हो क्या रहा है यहाँ?सारे...
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विशाल कश्यप
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[10 May 2010 20:33 PM]



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