काश ! हम इतने बड़े ना होते , हमें ये अहंकार विरासत में ना मिले होते

अथाह... सांझ ढले , वक़्त से वक़्त मिले , दो अबोध बालक घर से चले , कुछ दूर जाकर दोनों मिले , सुन्दर सी जगह ढूंढ़ ,खेलने लगे । बहुत ही मनमोहक उनका खेल हो रहा था ,खेल के बहाने मित्रता का मेल हो रहा था । खेलते - खलेते कुछ ही वक़्त गुज़रा , तभी एक बालक बिंगड़ा... [पूरी पोस्ट]
writer राजेन्द्र मीणा

जीवन-दर्शन

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[10 May 2010 15:58 PM]

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