कायनात का जादू बाकी है
इनदिनों शब्द मुझसे खेल रहे हैं मैं पन्नों पर उकेरती हूँ वे उड़ जाते हैं तुम्हारे पास ध्यानावस्थित तुम्हारी आँखों को छूकरकहते हैं - आँखें खोलो हमें पढ़ो ....मैं दौड़ दौडकर थक गई हूँ समझाया है -तंग नहीं करते पर ये शब्द !जो कल तक समझदारी की बातें करते थेआज...
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रश्मि प्रभा...
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[10 May 2010 13:15 PM]



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