एक गुन्चा, एक पेड़
साए तले दरख़्त के, इक नया पौधा खिला खुश हुआ दरख़्त, चलो एक साथी तो मिला !परवान पौधा चढ़ा, उस पेड़ के ही साए में,आँधियों में लिपटा कभी, सर्दियों में सिमटा उसमे,धूप झुलसाती तो, पत्तियां पेड़ की मरहम बनतीछाँव उसकी, गुन्चे के खेल का आँगन बनती,धीरे धीरे एक दिन,...
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योगेश शर्मा
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[10 May 2010 11:29 AM]



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