“एक पुराना मुक्तक” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

uchcharan “आज नेट की चाल बहुत मद्धिम है” इसलिए बस ये मुक्तक ही देख लीजिए!  दुर्बल पौधों को ही ज्यादा, पानी-खाद मिला करती है।चालू शेरों पर ही अक्सर, ज्यादा दाद मिला करती हैसूखे पेड़ों पर बसन्त का, कोई असर नही होता है-यौवन ढल जाने पर... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

मुक्तक

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[10 May 2010 10:23 AM]

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