Ajnabi
उमाकांत मालवीयझण्डे रह जायँगे, आदमी नहीं,इसलिए हमें सहेज लो, ममी, सही ।जीवित का तिरस्कार, पुजें मक़बरे,रीति यह तुम्हारी है, कौन क्या करे ।ताजमहल, पितृपक्ष, श्राद्ध सिलसिले,रस्म यह अभी नहीं, कभी थमी नहीं ।शायद कल मानव की हों न सूरतेंशायद रह...
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Rajey Sha
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[10 May 2010 10:26 AM]



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