दुखती रग
रोम-रोमहर रग-रग परदुखती हर नसजब रह-रह करजलते ज़ख्मों पर वार करेकष्टों की बंदिश पार करेद्रवित ह्रदयकुछ यादों मेंसिमटे, बिखरे जज्बातों मेंओझल आंचल के ख्वाबों मेंदुखती है रगचीत्कार सी करती हैकहती हैउनको मिले सज़ा जो मिलीकभी न कहीं किसेक्यों बांटी तब मौत...
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anupam mishra
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[10 May 2010 10:07 AM]



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